Tatya tope in hindi. 1857 Tatya Tope (2019) 2018-12-23

Tatya tope in hindi Rating: 5,9/10 199 reviews

Tatya Tope in the Indian Rebellion

tatya tope in hindi

He was executed at the on 18 April 1859 in Shivpuri. Tope admitted the charges brought before him saying that he was answerable to his master the only. He mobilised popular support in many regions and convinced some minor chieftains to support the rebellion. Pronunciation 'Pānḍurang' Vitthal The famous and much worshipped Deity, a form of Shrīvishṇu, in the temple at Pandharpur, Maharashtra Lakshmi 1. इसी बीच वर्ष 1857 में अंग्रेजों द्वारा ब्रिगियर जनरल हैवलक की अगवाई में कानपूर पर हमला बोल दिया.

Next

स्वतंत्रता सेनानी तात्या टोपे की जीवनी

tatya tope in hindi

आप ब्राहम्ण परिवार से ताल्लुक रखते थे और असली नाम रामचंद्र पांडुरंग येवलकर था. He was killed on 18 April 1859. However, his skills could not overcome British viciousness, resources and organisation. A re-look at Tatya Tope Tatya Tope continued to fight against a far superior British army. He induced the state forces to rebel against the raja and was able to replace the artillery he had lost at the Banas River. Tatya mustered a large force and sped towards besieged Jhansi fort. Tatya Tope could not be captured in the marathon chase of about 2,800 miles horizontally and vertically through forests, hills, dales and across the swollen rivers.


Next

Video तात्या टोपे का इतिहास व जीवन परिचय

tatya tope in hindi

He was unable to enter the town of and though announcing he would go south in fact went west towards Nimach. By January 1859 they were in the state of and experienced two more defeats. He denied any role in British civilian massacres. His small but highly mobile force drew the British into a cat-and-mouse game all across Central India. The end came when a close comrade betrayed Tatya Tope, in return for amnesty and restoration of his lands and titles. तात्या की माता नाम रूक्मिणी बाई था और वह एक गृहणी थी.

Next

स्वतंत्रता सेनानी तात्या टोपे की जीवनी

tatya tope in hindi

सन् 1857 में हुए बिद्रोह से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को अंग्रेज चुप करवाना चाहते थे, चूंकि इस विद्रोह में रानी लक्ष्मीबाई द्वारा बढचढ किर हिस्सा लिया गया था जिस कारण नाराज अंग्रेजी सेना ने ह्यूरोज की अगुवाई में झांसी पर हमला कर दिया था. जब तात्या बड़े हुए तो उन्हे पेशवा नें अपने यहां बतौर मुंशी की नौकरी दी, जिसे तात्या ने ईमानदारी व खुददारी के साथ निभाया एवं राज्य के कई भ्रष्ट कर्मचारियों को पकड़ा। तात्या की ईमानदारी व लगन को देखते हुए पेशवा बहुत प्रशन्न हुए जिसके फलस्वरूप उन्होंने तात्या को एक टोपी देकर सम्मानित किया. An important figure in the 1857 revolt, Ramachandra Pandurang Tope, better known as Tatya Tope, was born in 1814 in the present-day Nashik district of Maharashtra. तात्या जब छोटे थे तभी भारत में अंग्रेजों द्वारा अपना साम्राज्य स्थापित करने का भरसक प्रयास किया जा रहा था, जिसके चलते अंग्रेजों द्वारा भारत के कई राज्यों के राजाओं से उनके राज्य छीन लिए थे, इन्ही राजाओं में से एक थे पेशवा बाजीराव द्वितीय उनसे भी अंग्रेजों द्वारा राज्य को हथयाने की कोशिश की गयी जिस पर राजा बाजीराव ने उनके सामने हथयार डालने की जगह उनसे युद्ध लड़ने की ठानी लेकिन पेशवा हार गये और अंग्रेजों द्वारा उनके राज्य को भी अपने कब्जे में ले लिया गया. श्री सोलंकी ने अपनी पुस्तक में अनेक दस्तावेजों एवं पत्रों का उल्लेख किया है तथा उक्त पुस्तक के मुख्य पृष्ठ पर नारायणराव भागवत का चित्र भी छापा है.

Next

Tatya Tope Biography in Hindi : तात्या टोपे से जुड़ें दिलचस्प तथ्य

tatya tope in hindi

आज हम स्वतंत्रता सेनानी तात्या टोपे के जीवन से जुड़े कुछ दिलचस्प बातों को बताने की कोशिश कर रहें हैं- पूरा नाम रामचंद्र पांडुरंग येवलकर उप नाम तात्या टोपे जन्म 1814 ई0 , पटौदा जिला, महाराष्ट्र मृत्यु 18 अप्रैल, 1859 प्रमाणित नहींहै , शिवपुरी, मध्यप्रदेश पिता का नाम पाण्डुरंग त्रयम्बक माता का नाम रूक्मिणी बाई व्यवसाय स्वतंत्रता सेनानी तात्या टोपे का प्रारम्भिक जीवन- Early Life of Tatya Tope तात्या टोपे का जन्म एक छोटे गांव येवला जनपद नासिक, महाराष्ट्र में हा था. इस स्वतंत्रता संग्राम के विफल होने की मुख्य वजह भारत के अलग-अलग राज्यों के राजाओं में एकरूपता न होना थी, जिसका फायदा अंग्रेजों को मिला. This rebel confederacy was presided by Rao Saheb, but he was an ineffectual leader. A British flying column commanded by Colonel Holmes was in pursuit of him and the British commander in Rajputana, General Abraham Robert was able to attack the rebel force when they had reached a position between and. अंग्रेजी सेना द्वारा उनके खिलाफ तैयार किये गये विद्रोह को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया था लेकिन अंग्रेजों की लाख कोशिशों के वाबजूद तात्या टोपे अभी तक अंग्रेजों के हाथ नहीं लगे थे. इसी बीच 18 जून 1858 में ग्वालियर में अंग्रेजी सेना से हुए एक युद्ध में रानी लक्ष्मीबाई को हार का सामना करना पड़ा और उन्होंने अंग्रेजों के हाथ न लगने के लिए स्वयं को आग के हवाले कर दिया. अंग्रेजों उस वक्त 1818 ई0 में उन्हे प्रत्येक साल8 लाख रूपये पेंशन के तौर पर भी दिया करते थे.

Next

स्वतंत्रता सेनानी तात्या टोपे की जीवनी

tatya tope in hindi

Music: Warrior Strife - Jingle Punks. The British sent expeditions to capture Tatya who always outmaneuvered them but, not without losses. However, the cost to the British escalated. For over a year he continued a guerrilla campaign, aligning and realigning with various smaller rajas. However, he was defeated by General Napier's British Indian troops at Ranod and after a further defeat at abandoned the campaign. में जब बाजीराव स्वर्गवासी हो गये तो उनके स्थान पर नाना साहब पेशवाई के राजसिंहासन पर बैठे तात्या टोपे नाना साहब की सेवा में ही रत हो गये नाना साहब उनका बड़ा सम्मान करते थे वे उन्हें मित्र की भाँती अपने पास ही रखते थे और स्वयं भी उनकी आज्ञाओं पर अपने प्राण तक न्योछावर करने के लिए तैयार रहते थे नाना साहब ने जब अंग्रेजो से युद्ध करने के लिए स्वतंत्रता सैनिको की सेना गठित की तो उन्होंने तात्या टोपे को ही उसका प्रधान सेनापति बनाया तात्या टोपे Tatya Tope ने प्रधान सेनापति के रूप में स्वतंत्रता के समर में जिस अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन किया था उसका चित्रण शब्दों में नही किया जा सकता अंग्रेज लेखको ने उनके उस शौर्य पर मुग्ध होकर के ही उनकी उपमा नेपोलियन और गैरीबाल्डी से दी थी तात्या टोपे कानपुर में अंग्रेजो के खजाने की रक्षा में असीम शौर्य का प्रदर्शन किया था उन्ही के साहस और शौर्य से स्वतंत्रता सैनिक कानपुर से अंग्रेजो को बाहर निकालने में सफल भी हुए थे तात्या टोपे अंग्रेजो को देश से बाहर निकालना तो चाहते थे किन्तु निरपराध अंग्रेज स्त्रियों और बच्चो की हत्या नही करना चाहते थे तात्या टोपे की अद्भुत वीरता की चित्र उस समय देखने को मिलते है जब अंग्रेजो ने पुन: कानपुर पर अधिकार कर लिया था और नाना साहब को कानपुर ही नही , बिठुर को भी छोड़ देना पड़ा था तात्या टोपे ने कई हजार सैनिको के साथ अपने प्राणों की बाजी लगा दी उन्होंने सिंह की भांति दहाड़ते हुए अंग्रेजी सेना पर आक्रमण कर दिया और अंग्रेजो की रणनिति को मिटटी में मिलाकर आधे कानपुर पर पुन: आधिपत्य स्थापित कर लिया नाना साहब का पुन: बिठुर में आगमन हो सका था पर हवा का रुख अनुकूल न होने के कारण तात्या टोपे को पराजित होना पड़ा उनकी पराजय के फलस्वरूप अंग्रेजो का पुन: कानपुर पर अधिकार हो गया और नाना साहब को पुन: बिठुर छोड़ देना पड़ा कानपुर के मोर्चे पर पराजित होने के पश्चात तात्या टोपे ने कई मोर्चो पर अपने शौर्य के अद्भुत चित्र बनाये कालपी , झांसी , ग्वालियर और चरखारी आदि के मोर्चो पर उनकी बार-बार विजय और पराजय हुई पर वे न थके और न हारे बैसवाडा के जंगलो में जाकर छिप गये गुप्त रूप से अंग्रेजो के विरुद्ध नया मोर्चा बनाने लगे और गोरिल्ला युद्ध करने लगे जंगलो से बाहर निकलकर पुन: तात्या टोपे Tatya Tope ने अंग्रेजी सेना के लिए महासंकट उत्पन्न कर दिया अंग्रेजी सेना उन्हें बंदी बनाने के लिए धावे पर धावे मारती थी जाल बिछाती थी पर वे जाल के तन्तुओ को तोडकर निकल जाते थे अंग्रेजी सेना के हौसलों को मिटटी में मिला दिया करते थे तात्या टोपे ने अंग्रेजी सेनाओ के चक्रव्यूह को तोड़ते हुए जयपुर टोंक , चरखारी और झालावाड़ आदि कई राज्यों पर आक्रमण किया किसी से मित्रता स्थापित की और किसी से दंड में रूपये वसूले किये वे किसी स्थान पर जमकर नही रहे , क्योंकि अंग्रेजी सेना उनके पीछे पड़ी हुयी थी वे एक के पश्चात एक स्थान छोडते हुए दक्षिण में जा पहुचे पर अंग्रेज सेना ने तात्या टोपे को दक्षिण में भी शान्ति से रहने नही दिया न साधन न सैनिक विवश होकर उन्हें पुन: बैसवाडा के वनों में चला जाना पड़ा पर भाग्य विपरीत था उनके एक मित्र के विश्वासघात के कारण वे बंदी हो गये जिस दिन वे बंदी हुए वे 1859 ई.

Next

तात्या टोपे की जीवन परिचय

tatya tope in hindi

Then he reached Gwalior where he declared Nana Sahib as Peshwa with the support of the Gwalior contingent. Ambushed and captured on April 7, 1859, Tatya Tope was taken to a drumhead military court. This was because people were so displeased with the British and wanted freedom so badly that he could raise army of men who were ready to kill and die. He fought against the British near Sanganir, by the river Banas, and at Chotta Udaipur, among other places, quickly regrouping after every battle. At last he was betrayed by his trusted friend Mansingh. After this Tope was alone.

Next

तात्या टोपे

tatya tope in hindi

By the time British forces reached Kanpur, Tatya Tope and Nana Saheb had left the city. According to an official statement, Tantia Tope's father was Panduranga, an inhabitant of Jola Pargannah, Patoda Zilla Nagar, in present-day. तात्या की इस चाल से अंग्रेज बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने तात्या को हिरासत में लेने की मुहिम को और तेज कर दिया. जिसमें नाना साहब की हार हुई. इसके बाद इन दोनों ने हाथ मिला लिया और ग्वालियर के किले पर अपना अधिकार बनाये रखा. The fall of Gwalior was a turning point in the career of Tatya Tope. Tantia Tope began to act in Nana Sahib's name from Bithur.

Next